UGC act

 UGC Guideline 2026


UGC Guidelines को ठीक से समझिए 
Social media के वीर योद्धाओं से सावधान रहिए, 
लोकतंत्र में दबाव समूह की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और सरकारे संख्या बल, जो वास्तव में उसका Vote Bank है उसके सामने बड़ी आसानी से झुक जाती हैं और सही गलत का कोई मायने नहीं होता, किसके वोट से सरकारें बनती है सिर्फ यह मायने रखता है और social media पर भी इसी like और view का खेल चलता है और भीड़ जिस तरफ है, उसी तरफ लोग खड़े नजर आते हैं क्योंकि अपने दर्शकों का ध्यान रखना है .. कि वह उनके साथ बना रहे ... 
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आइए एक विश्लेषणात्मक अध्ययन करें 
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TV चैनलों के पत्रकार, वकील, बड़े Youtuber, और भाजपा के बड़े नेता भी अब तक इसको ठीक से पढ़े नहीं हैं और अब भी लोग ठीक से पढ़ नहीं रहे हैं और आम लोग जो मात्र भेंड़ चाल में ही यकीन रखते हैं उनको क्या कहा जाए, समर्थक और विरोधी दोनों का एक जैसा हाल है, जबकि इसमें OBC, SC/ST की तरह ही बाकी लोगों को भी जाति के अलावा पांच बिंदुओं पर एक जैसा संरक्षण हासिल है 


फिलहाल हमारे तमाम social network और अन्य मोर्चे के आंदोलनकारी खुद पढ़कर यह बताने का कष्ट करें कि पूरे प्राविधान में -


१- कहां लिखा है कि "समता समिति" में समान्य जाति (सवर्ण) के लोग नहीं होंगे, बल्कि यह लिखा है कि महिला, OBC, SC/ST, दिव्यांग लोगों के भी प्रतिनिधि होने चाहिए 


२- यह कहां लिखा है कि सामान्य वर्ग के लोग अपने खिलाफ होने वाले उत्पीड़न की शिकायत नहीं कर सकते, यह समान रूप से सभी छात्रों पर लागू होता है बस जाति वाले बिंदु पर OBC, SC/ST को विशेष छूट है बाकी पांच बिंदु सबके लिए है 


३- हां एक मजेदार बात -

झूठी शिकायत सिर्फ OBC, SC/ST ही नहीं सभी लोग कर सकते हैं 😄😄 और झूठा पाए जाने पर किसी के भी खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी क्योंकि इसका नियम ही नहीं है 


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आप भी पढ़ें सिर्फ सोशल network का शिकार न बनें

इसका link 

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आइए कुछ बिंदुओं को अक्षर सह आपके सामने रखते हैं और उनके अर्थ समझने की कोशिश करते हैं बाकी PDF download करके खुद पढ़िए,

 वैसे भी अध्ययन का अभाव सभी दल के नेताओं में समान रूप से दिखाई पड़ रहा है, इस कानून के बनाए जाने वाली सर्वदलीय कमेटी का नेतृत्व कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने किया था और इसमें भाजपा के सर्वाधिक सदस्य थे, फिलहाल इनमें से किसी की अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, इससे स्पष्ट है कि इन्हें इसकी कोई समझ नहीं है, बस इन्होंने सदस्य बनकर समय बिताया है और कानून बनाने में इनका कोई योगदान नहीं है, कानून बनाने वाले दूसरे प्रशासनिक लोग थे और उन्होंने अच्छा कानून बनाया है और इसकी आलोचना में भी कोई हर्ज नहीं है क्योंकि बेहतर होनी की संभावना हमेशा बनी रहती है और यह निरंतरता कभी भंग नहीं होनी चाहिए 



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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग 

(उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) 

विनियम -2026

नई दिल्ली, 13  जनवरी 2026


उद्देश्य - धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर, विशेष रूप से अनुसूचित जाति(SC) एवं अनुसूचित जनजाति(ST), सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग(OBC), आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS), दिव्यांगजनों अथवा इसमें से किसी के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन का संवर्धन देना ‌।


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वह लाइन जिसको लेकर बवाल किया जा रहा है -


जाति आधारित भेदभाव का अर्थ अनुसूचित जातियों अनुसूचित जनजातीय एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव है।


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यूजीसी की यह जो नियमावली, विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए है। आइए वास्तव में जो इसमें लिखा है उस पर बात करते हैं , बाकी एजेंडे के लिए सभी को शुभकामनाएं, अपना वाला अच्छे से चलाइए और जो इसमें कहीं नहीं लिखा है ,वह वाला मतलब निकालिए और उसी को प्रचारित करते रहिए


फिलहाल इसमें कुल छह बिंदु हैं -


जिसके आधार पर लोगों के साथ भेदभाव नहीं कर सकते हैं - 

धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता..


मतलब कोई भी किसी के साथ भेदभाव नहीं कर सकता-

कहीं भी यह नहीं लिखा है कि UR/General के साथ इन आधारों पर दूसरे समूह के लोग भेदभाव कर सकते हैं 


अब जाति वाले बिंदु पर आते हैं जिसकी अर्थ UGC ने जो लिखा है जिसके लिए इतना हल्ला मच रहा है 


जाति आधारित भेदभाव का अर्थ -


"अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातीय एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव है"


क्योंकि जाति की वजह से जो भेदभाव होता है वह OBC, SC/ST के सदस्यों के साथ उस जाति विशेष का होने के कारण होता है, सामान्य बच्चों के साथ भी होता है पर जाति उनकी वंचना का वजह नहीं होता, यह हमारी सामाजिक सच्चाई है, ऐसा नहीं है कि इस समूह के लोगों को जाति सूचक गाली और उससे जुड़ी मान्यताओं को लेकर शिकार नहीं बनाया जाता, पर यह घटनाएं उस तरह से आमतौर पर नहीं होती जो हमारे वंचित समूह के लोगों के साथ होती है 


अब इस नियमावली को गौर से पढ़िए कि "जाति" के अलावा जो पांच बिंदु हैं वह सब पर लागू होते हैं 


१- धर्म 

२-नस्ल

३-लिंग

४- जन्म स्थान 

५- दिव्यांगता 


क्या पूरे प्राविधान में कहीं यह लिखा है कि इन आधारों पर यदि आपके साथ भेदभाव होता है और वह भेदभाव करने वाला OBC, SC/ST वर्ग का हो तो आप उसके खिलाफ शिकायत नहीं कर सकते, हां जाति वाला विशेषाधिकार उसे मिला है और सवर्ण होने का सामाजिक विशेषाधिकार आपके अपनी जाति के कारण ही मिला है यह भी तो स्वीकार करिए। कोई प्रतयोगी परीक्षा टाप करके आप उच्च जाति में नहीं आए हैं यह जाति विशेष में जन्म के कारण ही है


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भेदभाव का अर्थ -


धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान, दिव्यांगता या इनमें से किसी एक के आधार पर किसी भी हितधारक के विरुद्ध कोई भी अनुचित, भेदभावपूर्ण या पक्षपात पूर्ण व्यवहार या ऐसा कोई कार्य चाहे वह स्पष्ट हो या अंतर निहित हो इसमें ऐसा कोई भी विभेद, बहिष्कार प्रतिबंध या पक्षपात भी शामिल है जिसका उद्देश्य या प्रभाव शिक्षा में समान व्यवहार को निष्प्रभावी या अक्षम करना है और विशेष रूप से किसी भी हितधाराक या हितधारकों के समूह पर ऐसी शर्ते लगाना है जो मानवीय गरिमा के प्रतिकूल हो..


इसमें कहां किसी जाति विशेष का संबोधन आ रहा है कि यह सिर्फ इसके लिए है और उसके लिए नहीं है 


लिंग का अर्थ -


पुरुष, महिला और तृतीय लिंग सम्मिलित है


मतलब यह सुरक्षा सिर्फ महिलाओं के लिए नहीं, तीनों समूहों के लिए है 


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हित धारक का अर्थ -


 छात्र, संकाय सदस्यों, कर्मचारी और प्रबंध समिति की सदस्य, जिसमें उच्च शिक्षा संस्थान का प्रमुख भी शामिल है 

इसमें भी किसी जाति विशेष का उल्लेख नहीं है अर्थात सभी लोग शामिल होंगे 


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इस प्राविधान के उद्देश्य में जिन वर्गों को विशेष रूप से सुरक्षा देने कि बात की गई है उस पर आते हैं -


"विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS), दिव्यांगजनों अथवा इसमें से किसी के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन का संवर्धन देना "


इसमें बेचारी महिलाओं का भी जिक्र नहीं है क्योंकि वो SC/ST, OBC, EWS और दिव्यांग में बिना किसी संदेह के आती ही हैं और आगे थोड़ा सा अक्ल के घोड़ों को खुला छोड़ दीजिए कि EWS, दिव्यांग, महिला और OBC Creamy Layer, 


(हां एक बात और OBC जाति नहीं है इसमें जातियां शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन की वजह से शामिल हैं, अर्थात यह SC/st की तरह जन्म के आधार पर मिली जाति की वजह से सुविधा नहीं है, इस वजह से इसमें बाभन, ठाकुर, बनिया जातियां भी हैं और लगातार लोग बेशर्मी से खुद को पिछड़ा बनाए जाने की मांग करते रहते हैं और इसी वजह से इसे इस श्रेणी को इस category में रखने का औचित्य न्यायालय में तार्किक आधार पर बचाना मुश्किल है और सरकार ने EWS को भी इसी वजह से OBC के साथ रखा है जिससे यह कहा जा सके कि सभी आरक्षित वर्गों पर यह समान रूप से लागू होता है)


अब सोचिए इसमें कौन लोग आते हैं बस बारीकी से शैतानी दिमाग का उपयोग करके देखिए कि SC/ST, OBC की तरह ही आप भी बाकी कानूनों की तरह इस कानून का भी बेजा इस्तेमाल कर सकते हैं, किसी को भी कोई रोक टोक नहीं है वैसे भी गलत शिकायत पाए जाने पर इसमें किसी कार्यवाही का प्राविधान नहीं है मतलब आपकी भी गलत शिकायत पर, आपको कोई नुकसान नहीं होने वाला है 


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उच्च शिक्षा संस्थान के कर्तव्य में जो लाइन उल्लेखित हैं वह कुछ इस तरीके से है -


हितधारकों के विरुद्ध भेदभाव को उन्मूलन करने तथा उनकी जाति, संप्रदाय, धर्म, भाषा, नृजातीयता, लिंग या दिव्यांगता के पूर्वाग्रह के बिना उनके हितों की रक्षा के लिए उचित संरचनात्मक एवं निवारक उपाय करेगा


इसमें भी कहीं किसी को भी विशेषाधिकार नहीं है 


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समान अवसर केन्द्र - महत्वपूर्ण बिंदु 


केंद्र इन विनियमों के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु नागरिक समाज, स्थानीय मीडिया, पुलिस, जिला प्रशासन, इस क्षेत्र में कार्यरत गैर सरकारी संगठन, शिक्षक सदस्यों कर्मचारी एवं अभिभावकों के साथ समन्वय स्थापित करेगा


इससे अधिकतम पारदर्शिता स्वत: सुनिश्चित हो जाएगी। मतलब कुछ भी चोरी छिपे नहीं हो सकता और सभी को अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा


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अब समान अवसर केंद्र में एक समता समिति होगी जिसका गठन संस्थान प्रमुख द्वारा केंद्र के कामकाज के प्रबंधन एवं भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच के लिए किया जाएगा 


समिति का गठन इस प्रकार होगा 


1-संस्थान प्रमुख पदेन अध्यक्ष होंगे 


2-उच्च शिक्षा संस्थान के तीन प्रोफेसर/वरिष्ठ संकाय सदस्य के रूप में 


3- उच्च शिक्षा संस्थान का एक कर्मचारी (शिक्षक के अतिरिक्त) सदस्य के रूप में 


4- व्यावसायिक अनुभव रखने वाले नागरिक समाज के दो प्रतिनिधि, सदस्य के रूप में 


5- दो छात्र प्रतिनिधि जिनका नामांकन शैक्षिक योग्यता/ खेलों में उत्कृष्ट/सह पाठयक्रम गतिविधियों में प्रदर्शन के आधार पर किया जाएगा विशेष आमंत्रित के रूप में 

(इसमें भी यहां जाति का उल्लेख नहीं है)


6- समान अवसर केंद्र का समन्वयक पदेन सदस्य सचिव के रूप में कार्य करेगा


समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए 


क्योंकि ज्यादातर इनके बिना ही सारे काम निपटा लिए जाते हैं ऐसे में समिति में सबका प्रतिनिधित्व हो इससे यह सुनिश्चित किया गया है, अर्थात सिर्फ सामान्य वर्ग के लोग न रहें


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समान अवसर केंद्र का प्रमुख कार्य क्या होगा


क- उच्च शिक्षा संस्थान में समुदाय को समग्र रूप से क्षमता एवं समान अवसर सुनिश्चित करना और सामाजिक समावेशन लाना 


ख- छात्रों शिक्षक एवं गैर शिक्षक कर्मचारियों के बीच समता का संवर्धन देना और साथ ही भेदभाव की धारणा का उन्मूलन करना 


ग- विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के बीच शैक्षिक संवाद तथा स्वस्थ अंतर व्यक्तिक संबंधों के विकास के लिए एक सामाजिक रूप से अनुकूल वातावरण बनाना 


घ - हित धारकों को सामाजिक समावेशन के प्रति संवेदनशील बनाने केप्रयास करना 


ङ - समाज के वंचित वर्ग से संबंधित व्यक्तियों या छात्रों के समूह की सहायता करना 


घ - किसी भी भेदभाव की घटना का प्रतिवेदन करने वाले पीड़ित व्यक्ति को प्रतिशोध से बचाना....


और भी है, उसमें भी विवाद करने जैसा कुछ नहीं है ।

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Social media पर जितनी कहानी बताई जा रही है, पूरा कानून कई बार पढ़ने के बाद भी मुझे ऐसा कुछ नहीं मिला जिसे सवर्ण विरोधी कहा जाए। रही उत्पीड़न की बात तो इसके लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार सभी के पास अवसर हैं सार खेल हमारी संवेदनशीलता का है कि हमें किस तरफ होना है ..

   जैसे ही नैतिकता, मानव गरिमा का हमें खयाल आएगा, ऐसे कानूनों की जरूरत नहीं रह जाएगी, गैर बराबरी, शोषण हमारी सच्चाई है और हमारे ही लोग मुख्य धारा से अब भी कटे हुए हैं, तमाम सरकारी प्रयास नाकाफी रहे हैं क्योंकि समाजिक और व्यैक्तिक स्तर पर अपनों की जब तक हम परवाह नहीं करेंगे कुछ नहीं होगा ऐसे न जाने कितने कानून आते जाते रहेंगे, मात्र कानूनों से होना होता तो न जाने हम कहां से कहां पहुंच गए होते 

क्या हम सिर्फ कागज और जिल्द बढ़ाते जाएंगे या फिर इस कालिख को भी समेटेंगे जो हमारे चेहरे पर लगी है 

©️ Rajhans Raju 

🌹❤️🙏🙏🌹❤️

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग 

(उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) 

विनियम -2012

लीजिए आपके सामने प्रस्तुत है यूजीसी का जो 2012 वाला रेगुलेशन है, उसकी नियमावली/विनियमन भी पढ़ लीजिए और 2026 वाले से तुलना कर लीजिए और ऐसे समझदार लोग, जिन्हें लगता है कि यह 2026 में पहली बार इस तरह का कानून आया है, उनको तो कुछ कहा ही नहीं जा सकता है, अरे भाई यह वाला कानून जो भेदभाव उन्मूलन से संबंधित है यह हमारे विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में 2012 से ही लागू है और 2012 वाला इस वाले से ज्यादा कठोर है पढ़ कर देख लीजिए अब आपको लगता है कि इस वाले कानून से आपकी जाति-बिरादरी का शोषण होने लगेगा और आपके बच्चे आगे नहीं बढ़ पाएंगे तो 2012 से ही ऐसा हो रहा था और आपको पता ही नहीं था कि आपके बच्चे कितने पीछे चले गए।


यह तो हमारे कुछ सोशल मीडिया के महान एक्टिविस्ट हैं जो इसकी मतलब 2026 वाले नियमावली की उल्टी-पुल्टी व्याख्या करके हमको भीड़ और भेंड़ बनाने में कामयाब हो गए। 

अब 2012 वाले कानून मतलब नियमावली का स्क्रीनशॉट, वह भी हिंदी में, आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहे हैं इसे भी पढ़ लीजिए, वैसे न पढ़ना कोई असामान्य बात नहीं है क्योंकि इस पढ़ाई लिखाई से हम कोसों दूर हैं फिलहाल केवल सोशल नेटवर्क पर सुनना हैं और रील देखना है, जो मनोरंजन के लिए अच्छा है पर जानकारी और पढ़ाई के लिए अगर आप इस पर निर्भर हो रहें है तो आपका मालिक भगवान तो बिलकुल भी नहीं है .


खैर जो 2012 वाली नियमावली है इसमें दंड का भी प्राविधान है जबकि 2026 वाले में बिल्कुल भी नहीं है और सिर्फ एक लाइन में जाति वाला जो हिस्सा है उसमें ओबीसी भी एससी, एसटी के साथ शामिल किया गया है मतलब लिखा गया है बाकी जगहों पर जाति वाला उल्लेख नहीं है 

समता समिति (equity committee) में ओबीसी, एससी, एसटी का प्रतिनिधित्व लिखा है ऐसा नहीं लिखा है कि इसमें दूसरी समूह के लोग नहीं होंगे क्योंकि ज्यादातर जो समितियां बनती हैं उसमें ओबीसी, एससी, एसटी लोग नहीं रहते हैं इसलिए यह लिखा है कुल 9-10 लोगों की यह कमेटी है उसमें सिर्फ तीन ओबीसी,एससी, एसटी लोगों के अनिवार्यता की गई है, यह सरकार की सभी समितियों के बनने/बनाने में लागू होता है, उसमें General/सामान्य का उल्लेख नहीं होता क्योंकि अधिकतर लोग इसी समूह के होते हैं और सामान्य कोई category नहीं है यह unreserved का स्वीकार्य सम्बोधन है ...

बाकी किसी को कुछ कहा नहीं जा सकता और कहना भी नहीं चाहिए, वैसे भी अब मामला सर्वोच्च न्यायालय में है और यह नियमावली 2012 की नियमावली को और प्रभावशाली बनाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर बनाया गया है। बाकी pressure group, सरकार, राजनीतिक गुणा गणित का अपना खेल है और न्यायालय और न्यायधीश भी इसी समाज का हिस्सा है और मोबाइल फोन इनके हाथ में भी है..

इस पूरे घटनाक्रम में एक बात, बहुत ही सकारात्मक है कि बिना हिंसा और आगजनी के, कैसे मोबाइल फोन लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक के अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन चुका हैं और उसकी बात सरकार को सुननी पड़ती है, सही-गलत होना अपनी जगह है पर बिना अराजकता के अपना विरोध दर्ज करना/कराना शानदार है और यह होना ही चाहिए ...

अब इस मोबाइल पर चलने वाले सोशल मीडिया के खेल को भी समझना होगा कि कैसे लोगों को misguide करने के लिए misinformation का इस्तेमाल किया जाता है जो चयनित सत्य और चयनित व्याख्या पर आधारित होता है। जो एजेंडा के अनुकूल होता है सिर्फ उसे ही परोसा जाता है और भीड़, श्रोता मतलब बाज़ार किस तरफ है इसका खास ध्यान रखना होता है और बताने से ज्यादा छुपाने पर जोर दिया जाता है 

अब अपना आकलन करिए आपका विचार स्वयं के अध्ययन, चिंतन, मनन, अवलोकन से बना है या फिर जाति-धर्म और फलनवा के पोस्टर से जहां पहुंचते ही एक खास चश्मा लग जाता और फिर कुछ दिखाई नहीं पड़ता। 


ऐसे में फिर वही बात भीड़ और भेंड़ बनने से बचिए और बन गए हैं तो वही जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते रहिए और इसके लिए आपको ढेर सारी शुभकामनाएं

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Comments

  1. इस तथ्य परक जानकारी के लिए आभार

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