Mahabharat
धर्मयुद्ध
हम सबको ऐसा क्यों लगता है की सारी लड़ाई आरएसएस और भाजपा ही लड़ेगी और जो करना है वह मोदी-योगी ही करेंगे? जब कोई संगठन बहुत बड़ा हो जाता है और कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के पद पर रहता है तब उसकी सीमाएं निश्चित हो जाती हैं और वह उसकी वजह से बहुत सारे काम नहीं कर पाता और उसको क्या बोलना है यह भी उन्हीं सीमाओं से तय होता है क्योंकि उसे तमाम अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय जवाबदेही और जिम्मेदारी में बंधकर काम करना पड़ता है जिसमें संविधान, कानून और संसदीय परंपराएं भी होती है जिसका ध्यान रखना होता है। वह हम आम लोगों की तरह उतना आजाद नहीं रह जाता है, यहां तक की जो विपक्ष के सांसद या नेता होते हैं, उनसे भी उसकी स्वतंत्रता कम हो जाती है और वह उतना खुलकर नहीं बोल सकता है जितना विपक्ष के लोग बोल सकते हैं क्योंकि सत्ता में रहने की वजह से उसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही और लोगों की अपेक्षा कहीं ज्यादा हो जाती है।
ऐसे में जो हमारा अपना इकोसिस्टम तैयार हो रहा है जाने अनजाने में हम लोग उसको नुकसान पहुंचा रहे हैं दूसरी तरफ जो लेफ्ट लिबरल (लेली गैंग) इकोसिस्टम है उसको गौर से देखिए वह कैसे एकजुट रहता है उसमें भी ढेर सारे संगठन, लोग और मान्यताएं हैं, वह अपने-अपने तरीके से पूरी तरह विकेन्द्रित होकर काम करते हैं और इसका सबसे अच्छा तरीका यह होता है कि एक दूसरे की आलोचना किए बिना, आप जहां भी हैं, जितने जगह में है, जितने लोगों के बीच हैं, बस अपना काम करते रहिए और अपने लोगों पर भरोसा रखिए। यह लड़ाई इतनी आसान नहीं है कि सब कुछ तुरंत हासिल कर लिया जाए, कौन कैसे क्या कर रहा है? इससे परेशान हुए बगैर अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते रहना है और इसके लिए दीर्घकालिक बड़ी योजनाएं बनानी पड़ती है कई बार एक-दो कदम पीछे भी हटाना पड़ता है, युद्ध की रणनीति को समझिए। सोचिए आज इंटरनेट है और हम लोग बहुत कुछ बोल रहे हैं, लिख रहे हैं तो यह क्यों हो पा रहा है? अगर यह सरकार न होती तो क्या इस तरीके से हम बोल सकते थे, लिख सकते थे, कह सकते थे? हम सनातन के सिपाही हैं और हमें सिपाही का काम समझना होगा, रणनीति सेनापति को बनाने दीजिए, उसके पास हमसे कहीं अधिक स्रोत्र हैं जहां से आ रही सूचनाओं का गहन विश्लेषण करना होता है और उसी अनुसार योजनाएं बनाई जाती हैं, सोचिए हर सिपाही सेनापति बन जाए तो युद्ध कौन लड़ेगा? बस इतना समझना है और इसी को ध्यान में रखना है ...
एक बात और कोई भी सरकार हो वह बहुत ताकतवर होती है, जब चाहे हमें रोक सकती है और कानून का जैसा चाहे वैसा इस्तेमाल कर सकती है अब यूजीसी नियमावली को ही लीजिए, यह 2012 से ही लागू है और इस सरकार में कितने छात्रों के खिलाफ कितनी कार्यवाही हुई इसके आंकड़े निकाल कर देख लीजिए, तो कौन सी सरकार सत्ता में है इससे बहुत फर्क पड़ता है और यह फर्क ऐसे ही बना रहे इसके लिए किसको सत्ता में रहना चाहिए यह तो हमें समझ में आना ही चाहिए। अच्छा ए बताइए कि यूजीसी 2026 की नियमावली से ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ा जो जाति विशेष के हितों को विरुद्ध हो गया है कहीं यह 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव की तैयारी तो नहीं है और हम उसके शिकार हो रहे हैं एक बात और मोदी योगी का विरोध कौन लोग कर रहे हैं। इसमें एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो भाजपा में है और एक बहुत बड़ा सरकारी अमला, वही अफसरसाही जिसे लगता है कि उसके भ्रष्ट होने के अवसर कम हो रहे हैं
ऐसा नहीं है कि इस सरकार में भ्रष्टाचार खत्म हो गया है पर पिछली सरकार से कम हुआ है यह भी तो सच है और सत्ता के गलियारे में बैठे लोग अब उस तरीके से या उतनी चोरी-दलाली नहीं कर पा रहे हैं ऐसे में मोदी योगी का विरोध होना तो स्वाभाविक ही है।
अब भाजपा आरएसएस के इतर दूसरे संगठनों और व्यक्तियों को जरा गौर से देखिए जैसे परमार्थ निकेतन, ब्रह्माकुमरी, जग्गी वासुदेव, श्री श्री रवि शंकर, आचार्य प्रशांत, बाबा रामदेव, मुरारी बापू, प्रेमानंद महराज, धीरेन्द्र शास्त्री, ...... ए सभी लोग सनातन के लिए काम कर रहे हैं उनके अपने तरीके हैं और हम जिस तरीके से सोचते हैं, समझते हैं, इस वजह से इन लोगों से ढेर सारे बिंदुओं पर असहमत हो सकते हैं पर सार्वजनिक मंचों पर उनकी आलोचना हमें नहीं करनी है, उन्हें गाली नहीं देना है, हम जिस भी स्तर पर हैं चाहे किसी टावर में हों, किसी गांव में, या फिर किसी छोटी बड़ी कॉलोनी में, तो वहां हमें अपनी बात सशक्त तरीके से रखना है, एक दूसरे को जोड़ना है आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद, भाजपा, बजरंग दल अपने तरीके से काम कर रहे हैं इनको उनके तरीके से काम करते देना है और हमें पूरी तरह से डिसेंट्रलाइज स्थानीय स्तर पर अपने तरीके से भी काम करना है। पर एक दूसरे को गाली नहीं देना है।
मान लीजिए इस्कॉन वाले कुछ ऐसा कर रहे हो जिससे हम असहमत हों, पर वह जो काम कर रहे हैं उससे श्रीमद् भगवत गीता का प्रसार हो रहा है, घर वापसी, वेदांत चिंतन को लेकर उनका अनुपम योगदान है कभी-कभी स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से कुछ ऐसे निर्णय लेने पड़ते हैं जिसकी जानकारी सभी लोगों को नहीं होती और मीडिया में वह गलत, आपराधिक खबरों की तरह परोसा जाता हैं हमें उनके बहकावे में आकर हिन्दू विरोधी भावनाओं में नहीं बहना है। बहुत सारी बातें स्थानीय स्तर पर, संगठन से जुड़े स्थानीय लोगों की योजना से संचालित होती है कि अपने शत्रुओं को कैसे रोका जाए और कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ा जाए। इस बात को हम सभी को समझना होगा और भावनाओं के अतिरेक से बचना होगा, जहां हम सतही जानकारी के आधार पर निर्णय लेने लग जाते हैं और अपनी समझ को अंतिम सत्य घोषित करने लग जाते हैं और वहीं से गलती की शुरुआत होती है फिर उसके बचाव में अहर्निस तर्कों की श्रृंखला शुरू हो जाती है और हम अपने ही मान मर्दन में लग जाते हैं, यह मार्गदर्शक और बुद्धिजीवी होने का भ्रम आत्मघाती साबित होता है।
इस तरह बहुत सारे लोग और संगठन हैं जो अपने-अपने स्तर पर काम कर रहे हैं बस उनके साथ खड़ा होना है क्योंकि स्थानीय ज़रूरतें, समस्याएं और लोग अलग-अलग विचारधारा और पृष्ठभूमि के होते हैं और सबको एक ही तरीके से नहीं समझाया जा सकता है क्योंकि हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं ऐसे में हमारे पास सत्ता का होना बहुत जरूरी है वह चाहे जैसे हो साम-दाम-दंड-भेद से अपने पास रहना ही चाहिए और इस बात को समझना बेहद जरूरी है। यह युद्ध है और इसमें हम सबको अपने हिस्से की कीमत चुकानी पड़ेगी, कुछ देना पड़ेगा, झुकना होगा और यह करने में परहेज नहीं करना होगा।
इसको हम इस्लामी संगठनों और उनके लोगों से समझ सकते हैं, वह कौन सी रणनीति अपनाते हैं, ईसाई संगठनों को देखिए वह किस तरीके से योजनाबद्ध ढंग से चलते हैं और अपने लोगों के साथ एकजुट रहते हैं। यह जो लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम है उसको भी थोड़ा ध्यान से देखिए आपस में बहुत बड़ी असहमति होने पर भी एक दूसरे के पीछे लठ्ठ लेकर नहीं दौड़ने लग जाते हैं और इसके इतर हम क्या करते हैं? इस पर भी गौर करिए और जवाब खुद को ही देना है कि हम किस तरीके से खुद को क्षति पहुंचाने में माहिर हैं और जाने अनजाने में किसी और के toolkit का हिस्सा बन जाते हैं।
हमको अपने लोगों के खिलाफ खड़ा करना कितना आसान है जो लोग हमारे लिए लड़ मर रहे हैं या हमें यहां तक ले आए हैं उनका कृतज्ञ होने के बजाय, हम उन्हें ही गाली देने लग जाते हैं, हमारी सनातन परंपरा बहुत गहरी है और हमारी मान्यताएं इतनी विविधता से भरी है कि किसी एक पर सहमत हुआ ही नहीं जा सकता है ऐसे में हमारे लोग तमाम तरीके विकसित करते रहते हैं और उनका मकसद सनातन की जड़ों को मजबूत करना होता है इस बात को समझना होगा कि वह हमारे जैसे और हमारे तरीके से ही काम करें यह आवश्यक नहीं है सनातन की शक्ति बढ़नी चाहिए यह आवश्यक है। जो आस्तिक नास्तिक तरीके से या फिर कुछ और ढंग से हमारे धार्मिक मान्यताओं को आगे बढ़ाते हैं उनसे नाराज मत होइए उनसे लड़िए नहीं.. जैसे हमारे कबीर पंथी लोग हैं वह सनातन की परंपराओं को ही आगे बढ़ा रहे हैं और ऐसे ही तमाम मत मतांतर हैं जो हमीं हैं, यह हमारी अभिव्यक्ति और खोज की स्वतंत्रता का अद्भुत प्रमाण है और यह हमारी कमजोरी नहीं है बल्कि यही ताकत है जो हमें सर्वव्यापी बना देता है ..
अब सोचिए जैसे इस्लामी आक्रमण, ईसाई आक्रमण, अंग्रेजी शासन इस दौरान भी हम क्यों सुरक्षित रहे, क्यों बचे रह गए? क्योंकि हम विकेंद्रीत थे, कोई एक धर्म गुरु, कोई एक ऐसी व्यवस्था नहीं थी जिसके अधीन हिंदू हो, हर बिंदु केंद्र बिंदु बन सकता हो तो केंद्र की तलाश भला कौन कर पाएगा जो वट वृक्ष है उसकी जड़े इतनी स्वतंत्रत हैं कि वृक्षों की अनंत श्रृंखला बनने की एक निरंतर प्रक्रिया चल रही है और इसी प्रक्रिया के हम अंग हैं...
ऐसे में हम सारी उम्मीदें आरएसएस, भाजपा से या फिर इन्हीं जैसे कुछ संगठनों से क्यों कर रहे हैं? यह जैसे कर रहे हैं, सब कुछ उन्हें वैसा अपने तरीके से करने दीजिए, उनका अपना अनुभव और वैचारिक यात्रा है, जो यहां तक अपने साथ हमें लेकर आए हैं यह भी तो सच है और इसे स्वीकार करना होगा, साथ ही कृतज्ञ भी होना चाहिए।
अब मान लीजिए कुछ बिंदुओं पर हम असहमत हो रहे हैं पर उसके सार्वजनिक प्रदर्शन से बचना है क्यों कि यह हमें कमजोर बनाएगा और जो सनातन की लड़ाई है वह पीछे जाएगी क्योंकि लड़ तो हम सभी रहे हैं और इस लड़ाई का श्री गणेश कोई आज नहीं हुआ है, वह यही लोग हैं जो अलग-अलग कालखंड में अलग-अलग नाम और पहचान से लड़ते रहे, हमें भी लड़ना है और इस लड़ाई को आगे ले जाना है पर कैसे? हमें अपना तरीका निकालना होगा, सीखना होगा और स्थानीय स्तर पर अपने तरीके से काम करना होगा, यह बात समझनी होगी और हमारे मूल में जो समस्याएं हैं उसका समाधान किए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता है उस मूल को समझना होगा। अब भी हम बड़ी छोटी जाति की बीमारी से ग्रसित हैं और छुआछूत जैसी समस्या कम ज्यादा के आंकड़ों के साथ मौजूद है और अपने श्रेष्ठता का मिथक बनाए रखना चाहते हैं, सोचिए हिन्दू जनजागृति, हिन्दू एकता कैसे संभव है, इससे मुक्ति से शुरुआत हमें अपने व्यक्तिगत स्तर से करनी होगी कि मैं ऐसा कोई भेदभाव नहीं मानूंगा और देखिए यह कितनी जल्दी हम के उदघोष में बदल जाता है...
अच्छा सोचिए कुछ समय पहले तक ब्राह्मणवाद, मनुस्मृति को लेकर लोग कुछ भी बोलते रहते थे और हम मौन स्वीकृति के साथ चुप रह जाते थे आज ढेर सारी बात होती है, लोग सुन रहे हैं सवाल पूछ रहे हैं कहां पर क्या लिखा हुआ है? यह दिखाओ, ऐसी मांग कर रहे हैं और तमाम श्लोक और शास्त्रों के उदाहरण दे रहे हैं तो ऐसा क्यों हो पा रहा है?
वंदे मातरम, राष्ट्रगीत की केवल दो पंक्तियां गाई जाती थी अब सभी छ: पंक्तियों को गाया जाएगा और सोचिए इस निर्णय का कोई विरोध नहीं हो पा रहा है तो यह माहौल किसने बनाया है तो उस मेहनत को बर्बाद मत करिए बहुत सारी चीजें हैं जिनसे असहमत हुआ जा सकता है लेकिन उस पेड़ को काटना ठीक नहीं है जिससे सारे फल मिले हैंं, उसके बीज संभालने होंगे, धैर्य से हमें पौधे रोपने हैं, उनको सींचना, सहेजना और खाद पानी देना है क्योंकि यही वट वृक्ष बनेंगे ...






















इस बेहतरीन मार्गदर्शन के लिए आभार
ReplyDeleteवाह क्या बात है
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